भय, बाधा और शत्रुओं से रक्षा तथा जीवन में साहस व सुरक्षा पाने के लिए साधक बटुक भैरव साधना के बारे में जानना चाहते हैं।
जीवन में अकारण भय, बाधाएं या शत्रु-प्रभाव महसूस होने पर सुरक्षा व साहस की खोज करना बिल्कुल स्वाभाविक है। बटुक भैरव भगवान शिव के बाल स्वरूप हैं — बटुक अर्थात बालक और भैरव अर्थात रक्षक। इनकी साधना भय-नाश, शत्रु-बाधा शांति, नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा और साहस-आत्मबल वृद्धि के लिए तंत्र शास्त्रों में विशेष रूप से वर्णित है।
सरल विधि: प्रतिदिन प्रातः स्नान के बाद स्वच्छ आसन पर बैठकर बटुक भैरव के समक्ष सरसों तेल का दीपक जलाएं और 'ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं' मंत्र की एक माला (108 जाप) करें। रविवार या मंगलवार का दिन इस साधना आरंभ के लिए विशेष शुभ माना गया है। भैरव जी को उड़द, तिल का तेल व काले वस्त्र अत्यंत प्रिय हैं, अतः इनका अर्पण करें और साधना के बाद जरूरतमंदों में उड़द या भोजन का दान करें। नियम-संयम व सात्विकता बनाए रखते हुए 21 दिन तक निरंतर जाप करने से भय व बाधा में स्पष्ट राहत अनुभव होती है, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है।
बटुक भैरव साधना तंत्र साधना की श्रेणी में आती है, अतः इसे उचित विधि, संकल्प व मार्गदर्शन में करना आवश्यक है ताकि पूर्ण व सुरक्षित लाभ मिले। बिना मार्गदर्शन के उग्र मंत्र-प्रयोग से बचें। इस साधना की विस्तृत व सुरक्षित विधि सीखने हेतु महाकाली तंत्र पीठ की 'बटुक भैरव बेसिक साधना' पुस्तिका देखें अथवा गुरुजी अमिताचार्य से Ultimate Spiritual Analysis में व्यक्तिगत मार्गदर्शन लें।
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