दुर्गा सप्तशती पाठ से पहले या नवरात्रि में कई साधक सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के महत्व और सही पाठ विधि के बारे में जानना चाहते हैं।
नवरात्रि में शक्ति साधना की ओर मन जाना और सही विधि जानने की जिज्ञासा होना एक शुभ संकेत है। सिद्ध कुंजिका स्तोत्र मार्कण्डेय पुराण में वर्णित है और इसे दुर्गा सप्तशती की 'कुंजी' कहा गया है — मान्यता है कि केवल इस स्तोत्र के पाठ मात्र से ही सप्तशती के संपुट, कवच, अर्गला व कीलक पाठ के समान फल की प्राप्ति होती है, विशेषकर समय की कमी होने पर।
महत्व व विधि: नवरात्रि के नौ दिनों में या प्रतिदिन प्रातः स्नान के बाद माँ दुर्गा के समक्ष घी का दीपक जलाकर सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करें — यह मात्र 5-7 मिनट में पूर्ण हो जाता है इसलिए व्यस्त साधकों के लिए विशेष उपयुक्त है। पाठ आरंभ करने से पूर्व 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे' नवार्ण मंत्र का एक बार उच्चारण करें, फिर स्तोत्र पढ़ें। इसका नियमित पाठ भय-नाश, रोग-बाधा शांति, कार्यसिद्धि व सुरक्षा प्रदान करने वाला माना गया है, विशेषकर मंगलवार, शुक्रवार व नवरात्रि में इसका फल शीघ्र मिलता है, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। पाठ शुद्ध उच्चारण व श्रद्धा के साथ करना आवश्यक है, अन्यथा फल अधूरा रह सकता है।
चूंकि यह एक सिद्ध तांत्रिक स्तोत्र है, इसकी सही उच्चारण विधि व संकल्प सीखना लाभकारी होता है। सही विधि सीखने के लिए महाकाली तंत्र पीठ की सम्बंधित साधना पुस्तिका देखें अथवा गुरुजी अमिताचार्य से Ultimate Spiritual Analysis या व्यक्तिगत मार्गदर्शन में परामर्श लें।
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