जब शिशु का जन्म गण्डमूल नक्षत्र में होता है, तब ज्योतिष में इसे "मूल दोष" कहा जाता है। ये वे नक्षत्र हैं जो राशि-संधि पर पड़ते हैं और केतु व बुध के स्वामित्व में आते हैं। मान्यता है कि इस दोष के प्रभाव को शांत करने हेतु मूल शांति पूजन कराया जाता है, जिससे शिशु व परिवार का कल्याण होता है।
| स्वामी | नक्षत्र |
|---|---|
| केतु | अश्विनी · मघा · मूल |
| बुध | अश्लेषा · ज्येष्ठा · रेवती |
परंपरा अनुसार शिशु के जन्म-नक्षत्र की पुनरावृत्ति पर (लगभग 27वें दिन) मूल शांति करना श्रेष्ठ है। यदि तब न हो सके, तो उसी नक्षत्र के अगले आवर्तन पर, या किसी शुभ मुहूर्त में किसी भी आयु में यह कराई जा सकती है। कुछ स्थानों में इसे उपनयन या विवाह से पूर्व भी संपन्न किया जाता है।
मूल शांति का उद्देश्य शिशु के जीवन में आरोग्य, दीर्घायु, मंगल व बाधा-रहित उन्नति की कामना करना है। यह भय या भ्रम का विषय नहीं, अपितु श्रद्धा व मंगल-कामना का संस्कार है — नक्षत्र-देवता व नवग्रहों के प्रति कृतज्ञता एवं शिशु-कल्याण की प्रार्थना।
शिशु के कल्याण हेतु सही मुहूर्त, नक्षत्र-देवता पूजन व विधिवत शांति — गुरु अमिताचार्य जी के मार्गदर्शन में। परामर्श हेतु संपर्क करें 🙏
🔱 प्रश्न / परामर्श →अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल व रेवती — ये छह गण्डमूल नक्षत्र हैं (केतु व बुध के स्वामित्व में)।
जन्म-नक्षत्र की पुनरावृत्ति पर (लगभग 27वें दिन) श्रेष्ठ; न हो सके तो अगले आवर्तन या शुभ मुहूर्त में।
यह भय का विषय नहीं; एक मंगल-संस्कार है जो शिशु के आरोग्य व कल्याण की कामना से किया जाता है।
विधिवत नवग्रह-नक्षत्र पूजन व हवन हेतु अनुभवी आचार्य का मार्गदर्शन आवश्यक है।