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मूल शांति पूजन विधि

मूल शांति पूजन विधि — गण्डमूल नक्षत्र दोष निवारण

आचार्य अमिताचार्य द्वारा · कर्मकांड · पढ़ने का समय ~6 मिनट

📖 इस लेख में
  1. मूल/गण्डमूल दोष क्या है?
  2. शांति कब कराएँ?
  3. पूजन विधि
  4. लाभ व भाव
  5. प्रश्न-उत्तर

मूल / गण्डमूल दोष क्या है?

जब शिशु का जन्म गण्डमूल नक्षत्र में होता है, तब ज्योतिष में इसे "मूल दोष" कहा जाता है। ये वे नक्षत्र हैं जो राशि-संधि पर पड़ते हैं और केतु व बुध के स्वामित्व में आते हैं। मान्यता है कि इस दोष के प्रभाव को शांत करने हेतु मूल शांति पूजन कराया जाता है, जिससे शिशु व परिवार का कल्याण होता है।

छह गण्डमूल नक्षत्र

स्वामीनक्षत्र
केतुअश्विनी · मघा · मूल
बुधअश्लेषा · ज्येष्ठा · रेवती
🔱 प्रत्येक नक्षत्र के चार चरण होते हैं; कुछ चरण अधिक व कुछ अल्प फल देने वाले माने जाते हैं। सटीक तीव्रता जन्म-कुंडली से आँकी जाती है।

मूल शांति कब कराएँ?

परंपरा अनुसार शिशु के जन्म-नक्षत्र की पुनरावृत्ति पर (लगभग 27वें दिन) मूल शांति करना श्रेष्ठ है। यदि तब न हो सके, तो उसी नक्षत्र के अगले आवर्तन पर, या किसी शुभ मुहूर्त में किसी भी आयु में यह कराई जा सकती है। कुछ स्थानों में इसे उपनयन या विवाह से पूर्व भी संपन्न किया जाता है।

पूजन विधि (सार)

  1. संकल्प व शुद्धि: यजमान स्नान कर, आचार्य के निर्देशन में शिशु-कल्याण का संकल्प लेते हैं।
  2. कलश व गणेश-पूजन: मंगल-कलश स्थापना, गणपति व मातृका-पूजन से आरंभ।
  3. नवग्रह व नक्षत्र-देवता पूजन: नवग्रह मंडल तथा जिस नक्षत्र में जन्म हुआ, उसके अधिष्ठाता देवता का आवाहन-पूजन।
  4. अभिषेक: पवित्र जल, औषधि व मंत्रों से कलश-जल तैयार कर शिशु का अभिषेक (मूल-शांति स्नान) किया जाता है।
  5. हवन: संबंधित नक्षत्र-मंत्र व शांति-मंत्रों से आहुति दी जाती है।
  6. दर्शन-विधि: कुछ परंपराओं में पिता 27वें दिन तक शिशु का मुख नहीं देखते; शांति के पश्चात् घृत/दर्पण में प्रतिबिंब देखकर प्रथम दर्शन करते हैं।
  7. दान व आशीर्वाद: अंत में यथाशक्ति दान, ब्राह्मण-भोज व आशीर्वचन से समापन।
🕉️ शांति-भाव: ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः … सर्वं शान्तिः।

लाभ व भाव

मूल शांति का उद्देश्य शिशु के जीवन में आरोग्य, दीर्घायु, मंगल व बाधा-रहित उन्नति की कामना करना है। यह भय या भ्रम का विषय नहीं, अपितु श्रद्धा व मंगल-कामना का संस्कार है — नक्षत्र-देवता व नवग्रहों के प्रति कृतज्ञता एवं शिशु-कल्याण की प्रार्थना।

⚠️ मूल दोष से भयभीत न हों। यह शांति एक मंगल-संस्कार है; इसे अनुभवी आचार्य के मार्गदर्शन व शुभ मुहूर्त में ही संपन्न कराएँ।

🕉️ शुभ मुहूर्त में मूल शांति व नक्षत्र-दोष निवारण

शिशु के कल्याण हेतु सही मुहूर्त, नक्षत्र-देवता पूजन व विधिवत शांति — गुरु अमिताचार्य जी के मार्गदर्शन में। परामर्श हेतु संपर्क करें 🙏

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प्रश्न-उत्तर (FAQ)

कौन-से नक्षत्र गण्डमूल हैं?

अश्विनी, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल व रेवती — ये छह गण्डमूल नक्षत्र हैं (केतु व बुध के स्वामित्व में)।

मूल शांति कब कराएँ?

जन्म-नक्षत्र की पुनरावृत्ति पर (लगभग 27वें दिन) श्रेष्ठ; न हो सके तो अगले आवर्तन या शुभ मुहूर्त में।

क्या मूल दोष हानिकारक है?

यह भय का विषय नहीं; एक मंगल-संस्कार है जो शिशु के आरोग्य व कल्याण की कामना से किया जाता है।

क्या घर पर कर सकते हैं?

विधिवत नवग्रह-नक्षत्र पूजन व हवन हेतु अनुभवी आचार्य का मार्गदर्शन आवश्यक है।

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