उपनयन सोलह संस्कारों में एक प्रमुख संस्कार है। "उप + नयन" अर्थात् निकट ले जाना — शिष्य को गुरु के, तथा साधक को गायत्री व ब्रह्म-विद्या के निकट ले जाने का संस्कार। इसी से बालक "द्विज" (दूसरा जन्म पाने वाला) कहलाता है और उसका ब्रह्मचर्य व वेदाध्ययन आरंभ होता है। इसे व्रतबंध, यज्ञोपवीत या जनेऊ संस्कार भी कहते हैं।
परंपरा में बालक के लगभग आठवें वर्ष में उपनयन का विधान है (कुल-परंपरा अनुसार आयु में भेद संभव)। यह शुभ मास, तिथि, नक्षत्र व मुहूर्त देखकर किया जाता है; उत्तरायण व वसंत ऋतु विशेष शुभ मानी जाती है। किसी भी स्थिति में यह विवाह से पूर्व अवश्य संपन्न किया जाता है।
जनेऊ के तीन धागे केवल सूत्र नहीं, गहरे प्रतीक हैं — तीन ऋण (देव-ऋण, ऋषि-ऋण, पितृ-ऋण), तीन गुण (सत्, रज, तम) पर संयम, तथा गायत्री के तीन पाद। ग्रंथि (गाँठ) ब्रह्म का प्रतीक है। विवाह के पश्चात् द्विगुण (छह तंतु) धारण किया जाता है, जो गृहस्थ-दायित्व का सूचक है।
उपनयन बालक के जीवन में अनुशासन, स्वाध्याय, संध्या-वंदन व गायत्री-उपासना का शुभारंभ है। यह उसे आध्यात्मिक उत्तरदायित्व, आत्म-संयम व ज्ञान-मार्ग से जोड़ता है — केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, अपितु चरित्र-निर्माण का संस्कार।
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🔱 प्रश्न / परामर्श →परंपरा अनुसार लगभग 8 वर्ष में (कुल अनुसार भेद संभव); विवाह से पूर्व अवश्य।
'उप+नयन' = निकट ले जाना — शिष्य को गुरु व गायत्री-विद्या के निकट ले जाने का संस्कार; इससे बालक 'द्विज' कहलाता है।
तीन ऋण (देव, ऋषि, पितृ), तीन गुण (सत्-रज-तम) व गायत्री के तीन पाद के प्रतीक; ग्रंथि ब्रह्म की सूचक।
गायत्री महामंत्र का उपदेश (दीक्षा) — यही उपनयन का केंद्रीय व सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग है।