गृह प्रवेश केवल एक नए घर में रहने आना नहीं, अपितु एक मंगल संस्कार है जिसके द्वारा भवन को शुभ ऊर्जा से भर दिया जाता है। शास्त्रों में मान्यता है कि प्रत्येक भवन में वास्तु पुरुष का वास होता है; गृह प्रवेश पूजन द्वारा वास्तु देवता, गृह-दिशाओं के स्वामी तथा नवग्रहों को प्रसन्न कर, नकारात्मक ऊर्जा को शांत किया जाता है।
विधिवत पूजन से घर में सुख, समृद्धि, आरोग्य व शांति का वास होता है और परिवार के सदस्यों के जीवन में बाधाएँ दूर होकर मंगल की स्थापना होती है। इसीलिए बिना पूजन के नवीन गृह में निवास आरंभ करना उचित नहीं माना जाता।
गृह प्रवेश के प्रकार
शास्त्रों में गृह प्रवेश के तीन प्रकार वर्णित हैं। परिस्थिति के अनुसार उपयुक्त प्रकार का चयन किया जाता है —
प्रकार
अवसर
अपूर्व
नवनिर्मित घर में पहली बार प्रवेश — सबसे प्रमुख व विस्तृत पूजन।
सपूर्व
यात्रा, प्रवास अथवा कुछ समय बाहर रहकर पुनः उसी घर में प्रवेश।
द्वंद्वाह
अग्नि, जल, तोड़-फोड़ या जीर्णोद्धार के पश्चात् घर में पुनः प्रवेश।
🔱 अपूर्व गृह प्रवेश में वास्तु शांति सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि यह भवन का प्रथम मंगल पूजन होता है।
शुभ मुहूर्त
गृह प्रवेश का शुभ मुहूर्त अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रथम प्रवेश का प्रभाव दीर्घकाल तक रहता है। सामान्यतः माघ, फाल्गुन, वैशाख व ज्येष्ठ मास गृह प्रवेश हेतु श्रेष्ठ माने जाते हैं। नक्षत्रों में रोहिणी, मृगशिरा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, अनुराधा, चित्रा व रेवती शुभ माने जाते हैं।
किन समयों में टालें
चातुर्मास (आषाढ़ से कार्तिक) में सामान्यतः गृह प्रवेश नहीं किया जाता।
मलमास (अधिकमास), पितृपक्ष व सूर्य-गुरु के अस्त काल में इसे टाला जाता है।
मंगलवार व अमावस्या को सामान्यतः वर्जित माना गया है।
मुहूर्त निर्धारण में दिशा व वास्तु की भी भूमिका होती है — गृह-स्वामी की राशि, गृह का मुख्य द्वार किस दिशा में है, तथा तिथि-वार-नक्षत्र के योग को देखकर आचार्य सटीक मुहूर्त निकालते हैं।
पूजन सामग्री
गृह प्रवेश पूजन हेतु निम्न सामग्री पूर्व-तैयार रखें —
कलश (ताँबा/मिट्टी), उस पर रखने हेतु नारियल व लाल वस्त्र
आम के पल्लव व बंदनवार (द्वार सजाने हेतु), फूल-मालाएँ
हल्दी, कुमकुम, अक्षत (चावल), रोली, चंदन
नवधान्य (नौ प्रकार के अनाज) व सप्तमृत्तिका
पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) व गंगाजल
पान, सुपारी, लौंग, इलायची, कपूर, दीपक व घी
हवन सामग्री, समिधा (आम की लकड़ी), आहुति-द्रव्य व शुद्ध घी
वास्तु/गणेश यंत्र, स्वस्तिक, मौली (कलावा) व दक्षिणा
प्रथम प्रवेश हेतु दूध (रसोई में उबालने के लिए) व मिष्ठान्न
पूजन विधि
द्वार पूजन: मुख्य द्वार पर आम-पल्लव की बंदनवार बाँधें, दोनों ओर स्वस्तिक व कलश-चिह्न बनाएँ। दहलीज (देहली) का हल्दी-कुमकुम से पूजन कर प्रवेश-द्वार को शुभ बनाया जाता है।
संकल्प व शुद्धि: गृह-स्वामी दंपती स्नान कर, आचार्य के निर्देशन में गंगाजल से घर का प्रोक्षण (छिड़काव) कर, गृह-कल्याण का संकल्प लेते हैं।
गणेश-गौरी पूजन: सर्वप्रथम भगवान गणेश व माता गौरी का आवाहन-पूजन कर विघ्न-निवारण की प्रार्थना की जाती है।
कलश स्थापना: जल-भरे कलश पर आम-पल्लव व नारियल रखकर, मौली बाँधकर मंगल-कलश की स्थापना की जाती है, जो वरुण व सभी तीर्थों का प्रतीक है।
वास्तु पुरुष पूजन: भवन के केंद्र (ब्रह्मस्थान) में वास्तु पुरुष का आवाहन कर, वास्तु देवता व दिशाओं के स्वामियों का पूजन किया जाता है।
नवग्रह पूजन: नवग्रह मंडल पर नौ ग्रहों का पूजन कर ग्रह-शांति व अनुकूलता की कामना की जाती है।
हवन: हवन कुंड में अग्नि प्रज्वलित कर गणेश, वास्तु व नवग्रह मंत्रों से आहुतियाँ दी जाती हैं; अंत में पूर्णाहुति की जाती है।
प्रथम प्रवेश: दंपती दाहिना पैर आगे रखते हुए, कलश व मंगल-द्रव्य सहित घर में प्रवेश करते हैं।
दूध उबालना: रसोई में प्रथम बार दूध उबालकर उसका उफान लिया जाता है — यह घर में भरपूरी व समृद्धि का शुभ प्रतीक है। उसी से खीर/मिष्ठान्न बनाकर भोग लगाया जाता है।
भोग व भोजन: देवताओं को भोग अर्पित कर, ब्राह्मण-भोज तथा परिजनों-अतिथियों को भोजन कराया जाता है।
दान व आशीर्वाद: यथाशक्ति दान-दक्षिणा देकर आचार्य व बुजुर्गों के आशीर्वचन से पूजन का समापन होता है।
🕉️ मंगल-भाव: ॐ वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान् — गृह में सुख, शांति व समृद्धि का वास हो।
मुख्य मंत्र
पूजन के आरंभ में विघ्न-निवारण हेतु गणेश जी का स्मरण किया जाता है —
🕉️ ॐ गं गणपतये नमः
वास्तु देवता को प्रसन्न करने हेतु ऋग्वेदीय वास्तु मंत्र का प्रयोग किया जाता है —
🕉️ ॐ वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान्
🔱 वैदिक मंत्रोच्चारण शुद्ध व अनुभवी आचार्य के मुख से ही करवाना श्रेष्ठ है, जिससे उच्चारण-दोष न रहे।
लाभ
विधिवत गृह प्रवेश पूजन से अनेक शुभ फल प्राप्त होते हैं —
भवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार व नकारात्मकता का शमन।
वास्तु दोषों की शांति व दिशा-स्वामियों की अनुकूलता।
परिवार में सुख, समृद्धि, आरोग्य व पारस्परिक प्रेम की वृद्धि।
नवग्रहों की शुभता से जीवन में बाधाओं का निवारण।
देव-कृपा व पितरों के आशीर्वाद सहित नए जीवन का मंगल आरंभ।
सावधानी
⚠️ गृह प्रवेश सदैव शुभ मुहूर्त में ही करें; अशुभ काल या बिना पूजन के प्रवेश टालें। कलश स्थापना, वास्तु पूजन व हवन जैसे विधानों हेतु अनुभवी आचार्य का मार्गदर्शन आवश्यक है। जीर्णोद्धार या तोड़-फोड़ के बाद (द्वंद्वाह) पुनः प्रवेश में वास्तु शांति अवश्य करवाएँ।
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माघ, फाल्गुन, वैशाख व ज्येष्ठ मास गृह प्रवेश हेतु शुभ माने जाते हैं। चातुर्मास (आषाढ़ से कार्तिक) व मलमास में सामान्यतः गृह प्रवेश टाला जाता है।
गृह प्रवेश कितने प्रकार का होता है?
तीन प्रकार — अपूर्व (पहली बार नए घर में प्रवेश), सपूर्व (यात्रा या कुछ समय बाहर रहकर पुनः प्रवेश) व द्वंद्वाह (तोड़-फोड़, अग्नि या जीर्णोद्धार के बाद पुनः प्रवेश)।
क्या गृह प्रवेश में दूध उबालना आवश्यक है?
प्रथम प्रवेश पर रसोई में दूध उबालकर उसका उफान लेना समृद्धि व भरपूरी का प्रतीक माना जाता है। यह एक शुभ मंगल-परंपरा है।
क्या गृह प्रवेश आचार्य के बिना कर सकते हैं?
साधारण द्वार-पूजन घर पर संभव है, परंतु विधिवत वास्तु शांति, कलश स्थापना व हवन हेतु अनुभवी आचार्य का मार्गदर्शन व सही मुहूर्त आवश्यक है।