मंगला गौरी व्रत श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को रखा जाने वाला सौभाग्य व्रत है, जो माँ गौरी अर्थात् पार्वती जी को समर्पित है। शिव-पार्वती जिस अखंड दांपत्य-प्रेम के प्रतीक हैं, उसी की कामना से सुहागिन स्त्रियाँ यह व्रत करती हैं। "मंगला" शब्द मंगलवार और मंगल-कल्याण दोनों की ओर संकेत करता है, तथा "गौरी" स्वयं जगदंबा पार्वती का ही एक स्नेहमय स्वरूप है।
मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से स्त्री को अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, सुखी व स्नेहपूर्ण दांपत्य जीवन तथा उत्तम संतान का वरदान प्राप्त होता है। जिन कन्याओं या स्त्रियों की कुंडली में मांगलिक दोष हो अथवा वैवाहिक जीवन में बाधाएँ आती हों, उनके लिए भी यह व्रत विशेष कल्याणकारी माना गया है। श्रावण मास स्वयं भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है, और इसी मास के मंगलवार को गौरी-पूजन का यह क्रम शिव-पार्वती दोनों की संयुक्त कृपा का पर्व बन जाता है।
परंपरा अनुसार नवविवाहित स्त्रियाँ विवाह के पश्चात प्रायः पाँच वर्ष तक श्रावण के मंगलवारों को यह व्रत करती हैं। पहली बार व्रत का आरंभ प्रायः माता या सास द्वारा दी गई सामग्री से किया जाता है। व्रत का सार माँ गौरी को सोलह प्रकार की पूजन-सामग्री तथा सोलह शृंगार अर्पित करना है।
प्राचीन काल में किसी नगर में धर्मपाल नामक एक अत्यंत धनवान व्यापारी रहता था। धन-वैभव, यश और मान — किसी बात की उसे कमी न थी; उसकी पत्नी भी शीलवती और धर्मपरायण थी। किंतु इतने ऐश्वर्य के बीच भी दोनों के हृदय में एक गहरी पीड़ा थी — उनके कोई संतान न थी। पुत्र-सुख के अभाव में उनका विशाल भवन सूना-सूना जान पड़ता था।
संतान की कामना से दोनों दंपति ने देव-आराधना, दान-पुण्य और कठोर व्रत-उपवास आरंभ किए। उनकी अटूट श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया, परंतु साथ ही यह भी कह दिया कि वह पुत्र अल्पायु होगा — सोलह वर्ष की आयु पूर्ण होते ही सर्पदंश से उसकी मृत्यु निश्चित है। वरदान और शाप दोनों को नियति मानकर दंपति ने उसे स्वीकार किया।
समय आने पर व्यापारी के घर एक अत्यंत सुंदर और तेजस्वी पुत्र ने जन्म लिया। पुत्र को पाकर माता-पिता का हर्ष अपार था, किंतु उस भविष्यवाणी की छाया उनके मन को सदा घेरे रहती थी। जैसे-जैसे बालक बड़ा होता गया, माता-पिता की चिंता भी गहराती गई। जब वह लगभग सोलह वर्ष का होने को आया, तब माता-पिता ने सोचा कि विवाह-बंधन और किसी पुण्यशाली परिवार का सान्निध्य संभवतः उसकी आयु में मंगल कर सके।
खोज करते-करते उन्हें एक ऐसी कन्या मिली, जिसकी माता आजीवन मंगला गौरी व्रत की परम निष्ठावान साधिका थी। उस माता ने जीवन भर श्रावण के मंगलवारों को श्रद्धापूर्वक गौरी-पूजन किया था, और उसी व्रत के पुण्य-प्रताप से देवी गौरी ने उसे यह वरदान दिया था कि उसकी पुत्री सदा अखंड सौभाग्यवती रहेगी — उसका सुहाग कभी नहीं उजड़ेगा। व्यापारी के पुत्र का विवाह उसी कन्या के साथ संपन्न हुआ।
विवाह के पश्चात जैसे-जैसे वह भयावह घड़ी निकट आती गई — जब पुत्र की सोलहवीं वर्षगाँठ पर सर्पदंश से मृत्यु निश्चित थी — घर में शोक और आशंका का वातावरण घिर आया। परंतु उस पुण्यशीला कन्या के, जो अब उस पुत्र की पत्नी थी, अखंड सौभाग्य के तेज के आगे काल का विधान भी शिथिल पड़ गया। कहा जाता है कि जिस रात्रि उस युवक की मृत्यु का योग था, माँ गौरी की कृपा से वह संकट टल गया — विष निष्फल हो गया और मृत्यु उसे छूकर भी लौट गई।
यह सब उस कन्या की माता के आजीवन मंगला गौरी व्रत के पुण्य का ही प्रताप था। माँ गौरी की असीम अनुकंपा से न केवल युवक की रक्षा हुई, अपितु उसे दीर्घायु, आरोग्य और सुखी दांपत्य जीवन का वरदान भी प्राप्त हुआ। दोनों दंपति दीर्घकाल तक स्नेहपूर्वक, संपन्नता और संतान-सुख के साथ जीवन व्यतीत करते रहे।
इस कथा का सार यही है कि जो स्त्री श्रद्धा और नियम से मंगला गौरी व्रत करती है, माँ गौरी उसे अखंड सौभाग्य प्रदान करती हैं; उसके पति और संतान को दीर्घायु तथा उसके गृहस्थ जीवन को स्नेह, समृद्धि और मंगल से भर देती हैं। एक पीढ़ी का किया गया यह पुण्य आने वाली पीढ़ी की भी रक्षा करता है — यही इस व्रत की महिमा है।
परंपरा अनुसार पाँच वर्ष तक निरंतर व्रत करने के पश्चात, पाँचवें वर्ष श्रावण मास में अथवा पति की सहमति से किसी शुभ मुहूर्त में मंगला गौरी व्रत का विधिवत उद्यापन किया जाता है। उद्यापन में माँ गौरी का विशेष पूजन कर हवन किया जाता है और सोलह की संख्या को आधार मानते हुए दान दिया जाता है।
मंगला गौरी व्रत मुख्यतः श्रद्धा, मंगल-कामना और सौभाग्य का व्रत है। इसके प्रमुख भाव व लाभ इस प्रकार माने गए हैं—
| कामना | फल |
|---|---|
| सौभाग्य | अखंड सुहाग व सुखी दांपत्य जीवन |
| पति-कल्याण | पति की दीर्घायु व आरोग्य |
| दोष-शमन | मांगलिक दोष व वैवाहिक बाधाओं की शांति |
| संतान | उत्तम संतान व उसकी दीर्घायु |
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🔱 पूजा बुक करें →श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को यह व्रत रखा जाता है। मुख्यतः नवविवाहित स्त्रियाँ विवाह के बाद पाँच वर्ष तक इसे करती हैं।
अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु, सुखी दांपत्य, संतान-कल्याण तथा मांगलिक दोष के शमन हेतु माँ गौरी को समर्पित।
प्रायः पाँच वर्ष तक व्रत करने के बाद, पाँचवें वर्ष श्रावण में या पति की सहमति से शुभ मुहूर्त में विधिवत उद्यापन किया जाता है।
माँ मंगला गौरी (पार्वती) की — सोलह प्रकार की पूजन-सामग्री व सोलह शृंगार अर्पित कर, दीप जलाकर कथा सुनी जाती है।