संतोषी माता संतोष अर्थात् मन की तृप्ति व शांति की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। उनका व्रत विशेष रूप से शुक्रवार को किया जाता है और यह व्रत सरल, सुलभ तथा गृहस्थ जीवन में सुख-शांति देने वाला माना गया है। जो व्यक्ति श्रद्धा व संतोष के भाव से इस व्रत को धारण करता है, उसके जीवन के कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
इस व्रत की सबसे बड़ी शिक्षा है — संतोष। माता की कृपा उसी पर बनी रहती है जो जो कुछ प्राप्त हो उसमें संतुष्ट रहे, ईर्ष्या-द्वेष से दूर रहे और मन में मधुरता बनाए रखे। इसी भाव को प्रतीक रूप में व्रत के दौरान खट्टे (अम्ल) का त्याग कर के दर्शाया जाता है — जीवन से कटुता हटाकर मधुरता व संतोष अपनाने का संकल्प।
संतोषी माता का व्रत परंपरा अनुसार 16 शुक्रवार तक निरंतर किया जाता है; अनेक भक्त मनोकामना पूर्ण होने तक भी इसे रखते हैं। व्रत का पालन इस प्रकार किया जाता है —
किसी नगर में एक वृद्धा रहती थी, जिसके सात पुत्र थे। छह पुत्र कमाकर लाते और वृद्धा उनसे बड़े प्रेम से व्यवहार करती, परंतु सबसे छोटा पुत्र भोला व सीधा-सादा था। वृद्धा उसे कुछ न देती और छहों बड़े पुत्रों के भोजन के पश्चात जो जूठन बचती, वही उसे तथा उसकी पत्नी को खाने को मिलती। छोटी बहू स्वभाव से सुशील व सहनशील थी; वह बिना किसी शिकायत के सारा घर-काम करती, फिर भी उपेक्षा व अपमान ही सहती रही।
एक दिन छोटे पुत्र को अपनी दशा का बोध हुआ। उसने घर की स्थिति देखकर सोचा कि परदेश जाकर परिश्रम करूँ और भाग्य आजमाऊँ। जाते समय उसने पत्नी से कोई निशानी माँगी। बहू के पास देने को कुछ न था, अतः उसने हाथ धोकर गोबर से लीपे हुए आँगन से अपने हाथों की छाप उसकी पीठ पर लगा दी और यही निशानी देकर उसे विदा किया। पति परदेश चला गया, पर वहाँ से न कोई समाचार आया, न धन — और घर में बहू की दशा और भी दयनीय होती गई।
दुखी बहू एक दिन मंदिर की ओर गई, जहाँ संतोषी माता का व्रत हो रहा था। वहाँ उसने एक सेवा-परायण स्त्री (साधु-भाव की स्त्री) से व्रत की महिमा व विधि सुनी। उसे बताया गया कि शुक्रवार को गुड़-चने का भोग लगाकर, एक समय भोजन कर, खट्टे का पूर्ण त्याग करते हुए श्रद्धा से यह व्रत करने पर संतोषी माता समस्त संकट हर लेती हैं। बहू ने उसी दिन से माता का व्रत आरंभ कर दिया। वह प्रत्येक शुक्रवार श्रद्धापूर्वक व्रत रखती, गुड़-चना अर्पित करती और खट्टे से पूर्णतः दूर रहती।
माता की कृपा से थोड़े ही समय में उसके पति का परदेश में भाग्योदय होने लगा। जो काम पहले बिगड़ते थे, वे सँवरने लगे; उसका व्यापार बढ़ा और वह धन-धान्य से सम्पन्न हो गया। एक रात्रि माता की प्रेरणा से उसे अपनी पत्नी का स्मरण हुआ और घर लौटने की तीव्र इच्छा जागी। शीघ्र ही वह अपार धन-सम्पत्ति लेकर अपने नगर लौट आया। उसके आते ही घर की दरिद्रता दूर हुई और छोटी बहू के दिन फिरने लगे।
बहू ने कृतज्ञतावश संतोषी माता के व्रत का उद्यापन करने का निश्चय किया और परिवार के बालकों सहित पड़ोस के बालकों को खीर-पूरी के भोजन पर आमंत्रित किया। किंतु उसकी सम्पन्नता देखकर जेठानियाँ ईर्ष्या से भर उठीं। उन्होंने बहू का व्रत भंग करने की चाल चली — भोजन कराते समय उन्होंने चुपके से एक बालक को खट्टी वस्तु (इमली/खटाई) खिलाने-चटाने की व्यवस्था कर दी। इस प्रकार उद्यापन के दिन खट्टे का दोष हो गया और नियम खंडित होने से माता अप्रसन्न हुईं। परिणामस्वरूप बहू पर पुनः विपत्ति आ पड़ी और उसका सुख डगमगाने लगा।
बहू ने व्याकुल होकर पुनः माता की शरण ली। स्वप्न/प्रेरणा में उसे ज्ञात हुआ कि उद्यापन में खट्टे का दोष हो गया था, अतः पूर्ण श्रद्धा व सावधानी के साथ फिर से विधिवत उद्यापन करना चाहिए। बहू ने दृढ़ श्रद्धा के साथ, इस बार पूरी सतर्कता रखते हुए, आठ बालकों को खीर-पूरी का भोजन कराया, यथाशक्ति दक्षिणा दी और उस दिन घर में कहीं भी खट्टी वस्तु का स्पर्श तक न होने दिया। इस निष्ठा से संतोषी माता पुनः प्रसन्न हुईं, बहू का बिगड़ा सुख लौट आया, परिवार में सुख-शांति स्थापित हुई और माता की कृपा से उसे संतान-सुख का आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ।
16 शुक्रवार का व्रत पूर्ण होने पर अथवा मनोकामना पूर्ण होने पर संतोषी माता के व्रत का उद्यापन किया जाता है। उद्यापन उसी शुक्रवार को श्रद्धा व सावधानी के साथ इस प्रकार करें —
इस व्रत की आत्मा ही खट्टे (अम्ल) का त्याग है। व्रत के दिन तथा विशेषकर उद्यापन के दिन —
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🔱 पूजा बुक करें →परंपरा अनुसार लगातार 16 शुक्रवार व्रत करने के पश्चात विधिपूर्वक उद्यापन किया जाता है; मनोकामना पूर्ण होने तक भी व्रत रखा जा सकता है।
प्रत्येक शुक्रवार गुड़ और भुने हुए चने का भोग अर्पित किया जाता है और व्रती एक समय सात्त्विक भोजन ग्रहण करती हैं।
व्रत का मूल नियम है कि उस दिन खट्टी वस्तु न स्वयं खाएँ, न किसी को खिलाएँ, न घर में बनाएँ — यह संतोष व मधुरता के भाव का प्रतीक है और इसी नियम-पालन पर व्रत का फल आधारित है।
16वें शुक्रवार को 8 बालकों को खीर-पूरी का भोजन कराएँ, दक्षिणा दें और उस दिन घर में कोई खट्टी वस्तु न बनाएँ न खाएँ-खिलाएँ।