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संतोषी माता व्रत कथा

संतोषी माता व्रत कथा — शुक्रवार व्रत विधि व उद्यापन

आचार्य अमिताचार्य द्वारा · व्रत कथा · पढ़ने का समय ~7 मिनट

📖 इस लेख में
  1. संतोषी माता — परिचय व संतोष का भाव
  2. व्रत विधि (16 शुक्रवार, गुड़-चना, खट्टा वर्जित)
  3. संतोषी माता व्रत कथा
  4. उद्यापन विधि
  5. व्रत के लाभ
  6. सावधानी — खट्टे का नियम
  7. प्रश्न-उत्तर

संतोषी माता — परिचय व संतोष का भाव

संतोषी माता संतोष अर्थात् मन की तृप्ति व शांति की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। उनका व्रत विशेष रूप से शुक्रवार को किया जाता है और यह व्रत सरल, सुलभ तथा गृहस्थ जीवन में सुख-शांति देने वाला माना गया है। जो व्यक्ति श्रद्धा व संतोष के भाव से इस व्रत को धारण करता है, उसके जीवन के कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

इस व्रत की सबसे बड़ी शिक्षा है — संतोष। माता की कृपा उसी पर बनी रहती है जो जो कुछ प्राप्त हो उसमें संतुष्ट रहे, ईर्ष्या-द्वेष से दूर रहे और मन में मधुरता बनाए रखे। इसी भाव को प्रतीक रूप में व्रत के दौरान खट्टे (अम्ल) का त्याग कर के दर्शाया जाता है — जीवन से कटुता हटाकर मधुरता व संतोष अपनाने का संकल्प।

🪔 ॐ श्री संतोषी माये नमः

व्रत विधि — 16 शुक्रवार

संतोषी माता का व्रत परंपरा अनुसार 16 शुक्रवार तक निरंतर किया जाता है; अनेक भक्त मनोकामना पूर्ण होने तक भी इसे रखते हैं। व्रत का पालन इस प्रकार किया जाता है —

  1. संकल्प: प्रथम शुक्रवार को प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और मन में मनोकामना सहित संतोषी माता के व्रत का संकल्प लें।
  2. भोग — गुड़ व चना: पूजा-स्थान पर माता का चित्र या प्रतिमा स्थापित कर गुड़ और भुने हुए चने का भोग अर्पित करें। एक लोटे में जल भरकर रखें और कथा के पश्चात उस जल को घर में छिड़कें।
  3. पूजन: धूप-दीप, पुष्प व अक्षत से माता का पूजन करें, "ॐ श्री संतोषी माये नमः" का स्मरण करें और व्रत कथा श्रवण/पठन करें।
  4. एक समय भोजन: व्रत के दिन एक ही समय भोजन ग्रहण करें और सात्त्विक, सादा आहार लें।
  5. खट्टे का पूर्ण त्याग: यह व्रत का सर्वप्रमुख नियम है — व्रत के दिन खट्टी कोई भी वस्तु न स्वयं खाएँ, न किसी को खिलाएँ और न घर में खट्टा बनाएँ। इमली, नींबू, अचार, दही, खटाई आदि सर्वथा वर्जित हैं।
  6. निरंतरता: इसी प्रकार लगातार 16 शुक्रवार व्रत करें और 16वें शुक्रवार को विधिपूर्वक उद्यापन करें।
🔱 भोग में चढ़ाया गुड़-चना प्रसाद रूप में बाँटा जाता है, परंतु ध्यान रहे — व्रत वाले दिन प्रसाद व भोजन में कहीं भी खट्टे का स्पर्श न हो।

संतोषी माता व्रत कथा

किसी नगर में एक वृद्धा रहती थी, जिसके सात पुत्र थे। छह पुत्र कमाकर लाते और वृद्धा उनसे बड़े प्रेम से व्यवहार करती, परंतु सबसे छोटा पुत्र भोला व सीधा-सादा था। वृद्धा उसे कुछ न देती और छहों बड़े पुत्रों के भोजन के पश्चात जो जूठन बचती, वही उसे तथा उसकी पत्नी को खाने को मिलती। छोटी बहू स्वभाव से सुशील व सहनशील थी; वह बिना किसी शिकायत के सारा घर-काम करती, फिर भी उपेक्षा व अपमान ही सहती रही।

एक दिन छोटे पुत्र को अपनी दशा का बोध हुआ। उसने घर की स्थिति देखकर सोचा कि परदेश जाकर परिश्रम करूँ और भाग्य आजमाऊँ। जाते समय उसने पत्नी से कोई निशानी माँगी। बहू के पास देने को कुछ न था, अतः उसने हाथ धोकर गोबर से लीपे हुए आँगन से अपने हाथों की छाप उसकी पीठ पर लगा दी और यही निशानी देकर उसे विदा किया। पति परदेश चला गया, पर वहाँ से न कोई समाचार आया, न धन — और घर में बहू की दशा और भी दयनीय होती गई।

दुखी बहू एक दिन मंदिर की ओर गई, जहाँ संतोषी माता का व्रत हो रहा था। वहाँ उसने एक सेवा-परायण स्त्री (साधु-भाव की स्त्री) से व्रत की महिमा व विधि सुनी। उसे बताया गया कि शुक्रवार को गुड़-चने का भोग लगाकर, एक समय भोजन कर, खट्टे का पूर्ण त्याग करते हुए श्रद्धा से यह व्रत करने पर संतोषी माता समस्त संकट हर लेती हैं। बहू ने उसी दिन से माता का व्रत आरंभ कर दिया। वह प्रत्येक शुक्रवार श्रद्धापूर्वक व्रत रखती, गुड़-चना अर्पित करती और खट्टे से पूर्णतः दूर रहती।

माता की कृपा से थोड़े ही समय में उसके पति का परदेश में भाग्योदय होने लगा। जो काम पहले बिगड़ते थे, वे सँवरने लगे; उसका व्यापार बढ़ा और वह धन-धान्य से सम्पन्न हो गया। एक रात्रि माता की प्रेरणा से उसे अपनी पत्नी का स्मरण हुआ और घर लौटने की तीव्र इच्छा जागी। शीघ्र ही वह अपार धन-सम्पत्ति लेकर अपने नगर लौट आया। उसके आते ही घर की दरिद्रता दूर हुई और छोटी बहू के दिन फिरने लगे।

बहू ने कृतज्ञतावश संतोषी माता के व्रत का उद्यापन करने का निश्चय किया और परिवार के बालकों सहित पड़ोस के बालकों को खीर-पूरी के भोजन पर आमंत्रित किया। किंतु उसकी सम्पन्नता देखकर जेठानियाँ ईर्ष्या से भर उठीं। उन्होंने बहू का व्रत भंग करने की चाल चली — भोजन कराते समय उन्होंने चुपके से एक बालक को खट्टी वस्तु (इमली/खटाई) खिलाने-चटाने की व्यवस्था कर दी। इस प्रकार उद्यापन के दिन खट्टे का दोष हो गया और नियम खंडित होने से माता अप्रसन्न हुईं। परिणामस्वरूप बहू पर पुनः विपत्ति आ पड़ी और उसका सुख डगमगाने लगा।

बहू ने व्याकुल होकर पुनः माता की शरण ली। स्वप्न/प्रेरणा में उसे ज्ञात हुआ कि उद्यापन में खट्टे का दोष हो गया था, अतः पूर्ण श्रद्धा व सावधानी के साथ फिर से विधिवत उद्यापन करना चाहिए। बहू ने दृढ़ श्रद्धा के साथ, इस बार पूरी सतर्कता रखते हुए, आठ बालकों को खीर-पूरी का भोजन कराया, यथाशक्ति दक्षिणा दी और उस दिन घर में कहीं भी खट्टी वस्तु का स्पर्श तक न होने दिया। इस निष्ठा से संतोषी माता पुनः प्रसन्न हुईं, बहू का बिगड़ा सुख लौट आया, परिवार में सुख-शांति स्थापित हुई और माता की कृपा से उसे संतान-सुख का आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ।

🙏 बोध: जैसे संतोषी माता ने सीधी-सादी बहू की श्रद्धा से प्रसन्न होकर उसके सब कष्ट हरे, वैसे ही जो संतोष, विश्वास व नियम-पालन के साथ यह व्रत करता है, माता उस पर अवश्य कृपा करती हैं।

उद्यापन विधि

16 शुक्रवार का व्रत पूर्ण होने पर अथवा मनोकामना पूर्ण होने पर संतोषी माता के व्रत का उद्यापन किया जाता है। उद्यापन उसी शुक्रवार को श्रद्धा व सावधानी के साथ इस प्रकार करें —

  1. प्रातः स्नान कर पूजा-स्थान की शुद्धि करें और संतोषी माता का विधिवत पूजन कर गुड़-चने का भोग अर्पित करें।
  2. आठ बालकों को आदरपूर्वक आमंत्रित कर उन्हें खीर-पूरी का भोजन कराएँ; भोजन में चना-गुड़ भी रखें।
  3. भोजन के पश्चात प्रत्येक बालक को यथाशक्ति दक्षिणा व कुछ भेंट देकर आशीर्वाद लें।
  4. अत्यंत महत्वपूर्ण: उद्यापन के दिन घर में कहीं भी खट्टी वस्तु न बनाई जाए, न खाई-खिलाई जाए। कथा में यही एक असावधानी व्रत भंग का कारण बनी थी, अतः पूर्ण सतर्कता रखें।
  5. अंत में माता से मनोकामना-पूर्ति व परिवार के कल्याण की प्रार्थना कर, प्रसाद वितरण करें।

व्रत के लाभ

सावधानी — खट्टे का नियम

इस व्रत की आत्मा ही खट्टे (अम्ल) का त्याग है। व्रत के दिन तथा विशेषकर उद्यापन के दिन —

⚠️ यह व्रत श्रद्धा व लोकपरंपरा पर आधारित है। किसी को स्वास्थ्य-संबंधी परहेज़ हो तो विवेक व चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही उपवास करें।

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प्रश्न-उत्तर (FAQ)

संतोषी माता का व्रत कितने शुक्रवार करना चाहिए?

परंपरा अनुसार लगातार 16 शुक्रवार व्रत करने के पश्चात विधिपूर्वक उद्यापन किया जाता है; मनोकामना पूर्ण होने तक भी व्रत रखा जा सकता है।

व्रत में क्या भोग लगाया जाता है?

प्रत्येक शुक्रवार गुड़ और भुने हुए चने का भोग अर्पित किया जाता है और व्रती एक समय सात्त्विक भोजन ग्रहण करती हैं।

व्रत में खट्टा क्यों वर्जित है?

व्रत का मूल नियम है कि उस दिन खट्टी वस्तु न स्वयं खाएँ, न किसी को खिलाएँ, न घर में बनाएँ — यह संतोष व मधुरता के भाव का प्रतीक है और इसी नियम-पालन पर व्रत का फल आधारित है।

उद्यापन कैसे करें?

16वें शुक्रवार को 8 बालकों को खीर-पूरी का भोजन कराएँ, दक्षिणा दें और उस दिन घर में कोई खट्टी वस्तु न बनाएँ न खाएँ-खिलाएँ।

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