सत्यनारायण भगवान विष्णु का ही एक कल्याणकारी स्वरूप है — जहाँ "सत्य" ही नारायण है, अर्थात् जो सत्य के रूप में सर्वत्र व्याप्त परमेश्वर हैं। यह व्रत श्रद्धा, सत्य व संतोष का व्रत माना जाता है, जिसका उल्लेख स्कन्द पुराण के रेवाखण्ड में मिलता है। मान्यता है कि जो भी भक्त श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करता है, उसके सांसारिक दुःख दूर होकर धन-धान्य, संतान, यश व मोक्ष की प्राप्ति होती है।
यह व्रत प्रायः पूर्णिमा अथवा एकादशी को किया जाता है, किंतु किसी भी शुभ प्रसंग — गृह-प्रवेश, विवाह, संतान-जन्म, नववर्ष, संकल्प-सिद्धि अथवा मनोकामना-पूर्ति पर भी इसे संपन्न किया जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता है — बिना किसी ऊँच-नीच, जाति या वर्ग के भेद के, निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी अल्प सामग्री से यह व्रत कर सकता है; भगवान केवल भक्त की श्रद्धा देखते हैं, सामग्री की मात्रा नहीं।
सत्यनारायण व्रत का पूजन प्रायः पूर्णिमा के सायंकाल में किया जाता है। यजमान दिनभर उपवास (फलाहार) रखते हैं और सायं स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर, केले के पत्तों व स्तंभों से मंडप सजाकर पूजा-स्थल तैयार करते हैं।
| वर्ग | सामग्री |
|---|---|
| पूजन-आधार | चौकी, लाल/पीला वस्त्र, कलश, केले के पत्ते व स्तंभ, भगवान सत्यनारायण/विष्णु की मूर्ति या चित्र |
| पंचामृत | दूध, दही, घृत, शहद व शक्कर (तुलसीदल सहित) |
| अर्पण | रोली, अक्षत, पुष्प, तुलसी-पत्र, धूप-दीप, पंचमेवा, ऋतु-फल, पान-सुपारी, दक्षिणा |
| प्रसाद (सपाथा/सिन्नी) | सूजी (रवा) का शीरा — केला, दूध, घृत, शक्कर व मेवा मिलाकर; साथ में पंजीरी |
एक बार श्री सूत जी नैमिषारण्य में एकत्र ऋषि-मुनियों को यह पवित्र कथा सुनाते हैं, जो कभी देवर्षि नारद व भगवान विष्णु के बीच हुए संवाद के रूप में प्रकट हुई थी। नीचे यह कथा पाँच अध्यायों में क्रमशः प्रस्तुत है।
एक समय देवर्षि नारद तीनों लोकों में भ्रमण करते हुए मृत्युलोक में आए। उन्होंने देखा कि यहाँ के प्राणी अपने-अपने कर्मों के फलस्वरूप नाना प्रकार के दुःख, दरिद्रता व कष्ट भोग रहे हैं। उनका हृदय करुणा से भर उठा और वे विचार करने लगे कि किस उपाय से इन दुःखी जीवों का उद्धार हो सकता है। इसी चिंतन में वे क्षीरसागर पहुँचे, जहाँ श्वेतवर्ण, चतुर्भुज, शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी भगवान विष्णु विराजमान थे।
नारद जी ने प्रभु को प्रणाम कर विनयपूर्वक कहा — "हे नारायण! मृत्युलोक के जीव अनेक कष्टों में डूबे हैं। कृपया कोई ऐसा सरल उपाय बताइए जिससे वे थोड़े ही परिश्रम व साधन से अपने दुःखों से मुक्त हो सकें।" भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर उत्तर दिया — "हे नारद! एक अत्यंत उत्तम व सर्वसुलभ व्रत है — सत्यनारायण व्रत। जो मनुष्य श्रद्धा व भक्ति से इस व्रत को करता है, उसके समस्त दुःख दूर होते हैं और उसे इस लोक में सुख-समृद्धि एवं अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।"
प्रभु ने आगे कहा कि यह व्रत पूर्णिमा या किसी भी शुभ संध्या को किया जा सकता है। भक्त को चाहिए कि वह भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों व बंधु-बांधवों सहित मेरा पूजन करे, गंध-पुष्प-नैवेद्य अर्पित करे, केला, घृत, दूध व सूजी से बना प्रसाद (सिन्नी) निवेदित करे, तथा कथा सुनकर सबको प्रसाद बाँटे। जो इस विधि से व्रत करता है, उसकी सब मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। इतना कहकर भगवान ने इस व्रत की महिमा को उदाहरणों सहित समझाने का संकेत किया।
भगवान विष्णु ने नारद जी से कहा — "अब मैं तुम्हें बताता हूँ कि पूर्वकाल में इस व्रत को किन-किन ने किया और उसका क्या फल पाया।" काशी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। दरिद्रता से पीड़ित होकर वह भिक्षा माँगते हुए नित्य नगर में भटकता था। उसके दुःख को देखकर भगवान सत्यनारायण एक वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण कर उसके पास आए और बोले — "हे विप्र! तुम इतने दुखी क्यों हो?" ब्राह्मण ने अपनी दीनता बताई। तब वृद्ध ब्राह्मण-रूपी प्रभु ने उसे सत्यनारायण व्रत की विधि व महिमा बताई और कहा — "इस व्रत को करने से तुम्हारी दरिद्रता अवश्य दूर होगी।"
ब्राह्मण ने श्रद्धापूर्वक यह व्रत करने का संकल्प लिया। दूसरे दिन जब उसे भिक्षा में सामान्य से अधिक धन प्राप्त हुआ, तो उसने विधिपूर्वक सत्यनारायण व्रत संपन्न किया। भगवान की कृपा से शीघ्र ही उसकी दरिद्रता दूर हो गई और वह धन-धान्य से संपन्न हो गया। तब से वह प्रति मास श्रद्धापूर्वक यह व्रत करने लगा और सब सुख भोगता हुआ अंत में परम पद को प्राप्त हुआ।
एक बार जब यही ब्राह्मण व्रत कर रहा था, तभी एक लकड़हारा (लकड़ी बेचने वाला) उसके द्वार पर आया। उसने प्यास बुझाने के लिए वहाँ रुककर देखा कि ब्राह्मण एक व्रत कर रहा है। जिज्ञासावश उसने पूछा — "यह किस देव का व्रत है और इसका क्या फल है?" ब्राह्मण ने उसे सत्यनारायण व्रत की महिमा बताई। लकड़हारे ने प्रसाद ग्रहण कर मन-ही-मन संकल्प किया कि आज जितनी लकड़ी बेचकर धन मिलेगा, उससे मैं भी यह व्रत करूँगा। अगले दिन उसकी लकड़ी सामान्य से कहीं अधिक मूल्य पर बिकी। प्रसन्न होकर उसने विधिपूर्वक व्रत किया और भगवान की कृपा से समस्त कष्टों से मुक्त होकर सुखी व संपन्न हो गया।
आगे भगवान ने कहा — प्राचीन काल में राजा उल्कामुख नामक एक धर्मात्मा, सत्यवादी व जितेन्द्रिय राजा थे। वे प्रतिदिन देव-पूजन करते और प्रत्येक पूर्णिमा-अमावस्या को श्रद्धापूर्वक सत्यनारायण व्रत करते थे। एक बार जब वे भद्रशिला नदी के तट पर व्रत कर रहे थे, तभी साधु वैश्य नामक एक धनवान व्यापारी अपनी नौका सहित वहाँ आया। उसने राजा से पूछा — "हे राजन्! आप श्रद्धा से यह कौन-सा व्रत कर रहे हैं? मुझे भी इसकी विधि बताइए।" राजा ने उसे सत्यनारायण व्रत की महिमा सुनाई।
साधु वैश्य निःसंतान था और इसी दुःख से व्यथित रहता था। उसने संकल्प लिया — "यदि भगवान सत्यनारायण की कृपा से मुझे संतान प्राप्त हो, तो मैं अवश्य यह व्रत करूँगा।" घर लौटकर उसने अपनी पत्नी लीलावती को यह बात बताई। कुछ काल पश्चात् भगवान की कृपा से लीलावती गर्भवती हुई और उसने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया, जिसका नाम कलावती रखा गया। जब पत्नी ने व्रत करने की बात स्मरण कराई, तो साधु ने कहा — "कन्या के विवाह के अवसर पर यह व्रत करूँगा" — और इस प्रकार उसने अपने संकल्प को टाल दिया व विस्मृत कर बैठा। यही उसकी भूल आगे उसके कष्टों का कारण बनी।
समय बीता और कलावती विवाह-योग्य हो गई। साधु वैश्य ने एक सुयोग्य वर से उसका विवाह कर दिया, किंतु व्रत करने का अपना संकल्प फिर भूल गया। भगवान सत्यनारायण को यह अवहेलना उचित न लगी। कुछ समय बाद साधु वैश्य अपने जामाता (दामाद) के साथ व्यापार हेतु रत्नसारपुर नगर गया, जहाँ चन्द्रकेतु नामक राजा राज्य करते थे।
संयोगवश उन्हीं दिनों राजा के भवन से चोरी हुई, और चोर भागते हुए जिस स्थान पर साधु व उसका जामाता ठहरे थे, वहीं चुराया धन छोड़कर भाग गए। सिपाहियों ने वह धन वहीं पाकर दोनों को चोर समझकर बंदी बना लिया और राजा ने उन्हें कारागार में डाल दिया, उनका सारा धन भी जब्त कर लिया गया। यह सब भगवान सत्यनारायण के व्रत की उपेक्षा का ही परिणाम था।
उधर घर पर भी विपत्ति आ पड़ी — चोरों ने साधु का शेष धन भी चुरा लिया और माँ-बेटी दुःख व दरिद्रता में डूब गईं। भूख से व्याकुल कलावती एक दिन एक ब्राह्मण के घर पहुँची, जहाँ सत्यनारायण व्रत हो रहा था। कथा सुनकर उसे स्मरण हुआ कि उसके पिता ने जो संकल्प लिया था वह अधूरा रह गया है। घर लौटकर उसने माता लीलावती को यह बात बताई। तब माँ-बेटी दोनों ने पूरी श्रद्धा व भक्ति से सत्यनारायण व्रत किया और भगवान से प्रार्थना की कि उनके पति व पिता निर्दोष सिद्ध होकर मुक्त हों।
भगवान सत्यनारायण प्रसन्न हुए और राजा चन्द्रकेतु को स्वप्न में आदेश दिया कि दोनों बंदी निर्दोष हैं, उन्हें छोड़ दिया जाए। प्रातःकाल राजा ने दोनों को मुक्त कर, आदरपूर्वक धन-वस्त्र देकर विदा किया। साधु वैश्य अपने जामाता सहित प्रसन्न होकर नौका द्वारा घर की ओर चला।
मार्ग में भगवान सत्यनारायण फिर एक साधु-वेश में प्रकट हुए और पूछा — "हे वैश्य! तुम्हारी नौका में क्या है?" धन के अभिमान में चूर होकर साधु ने उपहासपूर्वक कहा — "इसमें तो केवल पत्ते व लताएँ भरी हैं।" भगवान ने कहा — "तुम्हारा वचन सत्य हो" और अंतर्ध्यान हो गए। कुछ ही देर में जब साधु ने नौका देखी, तो उसका सारा धन-रत्न वास्तव में पत्तों-लताओं में बदल चुका था। यह देख वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। तब उसे अपनी भूल का बोध हुआ और उसने प्रभु से क्षमा-याचना की। उसने संकल्प किया कि घर पहुँचकर वह श्रद्धापूर्वक व्रत करेगा और कभी भगवान के प्रसाद व संकल्प का अनादर नहीं करेगा। भगवान की कृपा से नौका फिर धन-रत्नों से भर गई।
जब साधु के घर पहुँचने का संदेश मिला, तब कलावती उस समय भी सत्यनारायण की कथा-प्रसाद में लीन थी। संदेश सुनकर वह प्रभु का प्रसाद ग्रहण किए बिना ही पति से मिलने दौड़ पड़ी। इस अनादर से भगवान रुष्ट हुए और कलावती के पति की नौका सहित सारा धन जल में डूब गया। कलावती विलाप करने लगी। तब साधु वैश्य को स्मरण हुआ कि यह प्रसाद-अनादर का ही फल है। उसने भगवान से क्षमा माँगी और कलावती ने लौटकर श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण किया — तत्क्षण उसका पति व डूबा हुआ धन दोनों सकुशल प्रकट हो गए। इसके पश्चात् साधु वैश्य आजीवन नियमपूर्वक सत्यनारायण व्रत करता रहा और परिवार सहित समस्त सुख भोगकर अंत में परम पद को प्राप्त हुआ।
अंत में भगवान ने एक और प्रसंग सुनाया। राजा तुंगध्वज नामक एक प्रतापी राजा थे। एक बार वे वन में आखेट के पश्चात् थककर एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे। समीप ही कुछ ग्वाल-बाल (गोप) बंधु-बांधवों सहित बड़े प्रेम व श्रद्धा से भगवान सत्यनारायण का व्रत व कथा-पूजन कर रहे थे। राजा ने यह सब देखा, किंतु अहंकारवश न तो पूजा में सम्मिलित हुए और न ही उन्होंने भगवान को प्रणाम किया। पूजा समाप्त होने पर ग्वालों ने राजा को सत्यनारायण का प्रसाद दिया, परंतु राजा ने राजमद में उस प्रसाद का अनादर कर उसे ग्रहण नहीं किया और अपने नगर लौट गए।
भगवान की अवहेलना का परिणाम शीघ्र ही सामने आया — राजा के नगर लौटते ही उसके सौ पुत्रों की मृत्यु हो गई और उसका समस्त धन, धान्य व राज्य-वैभव नष्ट हो गया। तब राजा को बोध हुआ कि यह सब भगवान सत्यनारायण के प्रसाद के अपमान का ही फल है। वे तुरंत उसी वन में गए, जहाँ ग्वाले पूजा कर रहे थे, और वहाँ पहुँचकर श्रद्धा व विनयपूर्वक भगवान सत्यनारायण की पूजा की तथा प्रसाद ग्रहण किया। प्रभु की कृपा से उनके सभी पुत्र पुनः जीवित हो उठे और खोया हुआ धन-वैभव व राज्य फिर से लौट आया। इसके पश्चात् राजा तुंगध्वज नित्य श्रद्धापूर्वक यह व्रत करते हुए इस लोक के सुख भोगकर अंत में विष्णुलोक को प्राप्त हुए।
कथा-श्रवण के पश्चात् भगवान सत्यनारायण की आरती "जय लक्ष्मी रमणा" गाकर की जाती है और तत्पश्चात् प्रसाद वितरित किया जाता है। इस व्रत में प्रसाद का विशेष महत्व है — यही समूची कथा का मुख्य नैतिक संदेश भी है। सूजी (रवा) का शीरा, केला, दूध, घृत, शक्कर व मेवा से बना यह प्रसाद अत्यंत पवित्र माना जाता है, और साथ में पंजीरी व चरणामृत भी वितरित की जाती है।
कथा हमें स्पष्ट रूप से सिखाती है कि प्रसाद का अनादर करने से हानि होती है — साधु वैश्य ने धन के अभिमान में प्रसाद व संकल्प की उपेक्षा की तो उसका धन पत्तों में बदल गया व दामाद कारागार में पड़ा; कलावती ने प्रसाद ग्रहण किए बिना दौड़ लगाई तो पति सहित नौका डूब गई; राजा तुंगध्वज ने प्रसाद का तिरस्कार किया तो पुत्रों व राज्य को खो बैठे। और जैसे ही तीनों ने श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण किया, उनकी सारी हानि पुनः समृद्धि में बदल गई। अतः व्रत में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को प्रसाद अवश्य ग्रहण करना चाहिए और उसे कभी व्यर्थ नहीं फेंकना चाहिए।
पूर्णिमा/शुभ अवसर पर विधिवत सत्यनारायण कथा, पंचामृत-पूजन व प्रसाद — गुरु अमिताचार्य जी के मार्गदर्शन में। पूजा बुकिंग हेतु संपर्क करें 🙏
🔱 पूजा बुक करें →प्रायः पूर्णिमा या एकादशी को; किंतु गृह-प्रवेश, विवाह, संतान-जन्म, मनोकामना-पूर्ति या किसी भी शुभ अवसर पर सायंकाल में यह व्रत किया जा सकता है।
पाँच अध्याय — (1) नारद-विष्णु संवाद व व्रत-महिमा, (2) निर्धन ब्राह्मण व लकड़हारा, (3) राजा उल्कामुख व साधु वैश्य, (4) साधु-कलावती व प्रसाद-अनादर, (5) राजा तुंगध्वज।
परंपरागत प्रसाद सूजी (रवा) का शीरा/सिन्नी है — केला, दूध, घृत व मेवा मिलाकर; साथ में पंचामृत व पंजीरी भी अर्पित की जाती है।
कथा अनुसार जिसने भी प्रसाद का अनादर किया उसे धन-जन की हानि हुई; श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण करते ही उसकी समृद्धि पुनः लौट आई। अतः प्रसाद अवश्य ग्रहण करें।