वैभव लक्ष्मी व्रत धन-धान्य, ऐश्वर्य, सुख-समृद्धि तथा गृह-शांति की कामना से किया जाने वाला अत्यंत पावन व्रत है। इसे शुक्रवार के दिन किया जाता है, क्योंकि शुक्रवार माँ लक्ष्मी का प्रिय दिन माना गया है। इस व्रत में साक्षात् धन, वैभव व सौभाग्य की अधिष्ठात्री माँ महालक्ष्मी की आराधना की जाती है। मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा, संतोष व पवित्र भाव से यह व्रत करता है, उसके घर में स्थायी लक्ष्मी का वास होता है और दरिद्रता, कलह व अशांति दूर होकर वैभव (समृद्धि) की पुनर्स्थापना होती है।
यह व्रत केवल भौतिक धन की ही नहीं, अपितु मन के संतोष, पारिवारिक प्रेम व सद्बुद्धि की भी कामना करता है — क्योंकि सच्चा वैभव वही है जिसमें धन के साथ शांति भी हो। इस व्रत का मूल भाव है — निष्ठा, संतोष व सदाचरण। भक्तगण माँ लक्ष्मी की स्तुति में श्री महालक्ष्म्यष्टकम् का पाठ भी करते हैं, जिसका सम्पूर्ण पाठ आप हमारी वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं।
वैभव लक्ष्मी व्रत सामान्यतः 11 अथवा 21 शुक्रवार तक किया जाता है। व्रत आरंभ करने से पूर्व मन में यह संकल्प लेना चाहिए कि आप कितने शुक्रवार यह व्रत करेंगे। संकल्पित संख्या पूर्ण होने पर उद्यापन किया जाता है। प्रस्तुत है सरल पूजन-विधि:
प्राचीन काल की बात है। एक बड़े नगर में अनेक प्रकार के लोग निवास करते थे — कोई धनवान तो कोई निर्धन, कोई सज्जन तो कोई दुर्जन। उसी नगर में शीला नाम की एक सुशीला व धर्मपरायण स्त्री अपने पति के साथ रहती थी। शीला स्वभाव से सरल, ईश्वर-भक्त तथा अतिथि-सेवा में तत्पर रहने वाली नारी थी। आरंभ में उसका गृहस्थ-जीवन सुख-शांति व पर्याप्त धन-धान्य से भरा-पूरा था।
समय के साथ शीला के पति की संगति बिगड़ गई। बुरे मित्रों के प्रभाव में आकर वह जुआ, मद्यपान व अन्य व्यसनों में फँसता चला गया। धीरे-धीरे उसने अपना कारोबार व धन सब कुछ इन्हीं दुर्व्यसनों में गँवा दिया। घर की सुख-शांति नष्ट हो गई, जो लक्ष्मी घर में वास करती थी वह रूठकर चली गई और उस सम्पन्न परिवार पर दरिद्रता व दुःख के बादल छा गए। भोजन तक के लाले पड़ गए, तथापि शीला ने धैर्य नहीं खोया और न ही ईश्वर पर से अपनी श्रद्धा डिगने दी।
एक दिन शीला अपने घर में उदास बैठी थी कि तभी एक वृद्ध, तेजस्वी व सौम्य स्त्री उसके द्वार पर आई। उसके मुख पर अद्भुत शांति व आभा थी। शीला ने बड़े आदर से उसका स्वागत किया, आसन दिया और अपनी दीन दशा में भी यथाशक्ति सेवा की। उस स्त्री के स्नेहपूर्ण व्यवहार से शीला का हृदय भर आया और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने अपने दुःख, पति के दुर्व्यसन तथा घर की दुर्दशा की सारी व्यथा उस देवी-स्वरूपा वृद्धा को कह सुनाई।
वृद्धा, जो वास्तव में माँ लक्ष्मी की ही एक भक्त-स्वरूपा थी, शीला की श्रद्धा व सेवा-भाव से प्रसन्न हुई। उसने शीला को सांत्वना देते हुए कहा — "पुत्री, धैर्य रखो। जो लक्ष्मी रूठकर गई है, वह श्रद्धा व भक्ति से पुनः प्रसन्न होकर लौट भी सकती है। तुम प्रत्येक शुक्रवार को माँ महालक्ष्मी का व्रत करो। सायंकाल स्वच्छ होकर कलश स्थापित करो, उसमें जल व सिक्का डालो, ऊपर कोई आभूषण लक्ष्मी-स्वरूप रखो, दीप जलाकर श्रद्धा से माँ लक्ष्मी का पूजन करो, खीर अथवा श्वेत मिष्ठान्न का भोग लगाओ, आरती करो और वही प्रसाद ग्रहण करो। यह व्रत निष्काम भाव व संतोष के साथ करना।"
वृद्धा ने आगे कहा — "किन्तु स्मरण रहे, यह व्रत केवल धन पाने के लोभ से नहीं, अपितु श्रद्धा, संतोष व सदाचरण के साथ करना। माँ लक्ष्मी उसी घर में स्थिर होती हैं जहाँ पवित्रता, सत्य व मधुर व्यवहार हो।" इतना कहकर वह तेजस्वी स्त्री अंतर्ध्यान हो गई। शीला समझ गई कि साक्षात् माँ लक्ष्मी ने ही उसे यह मार्ग दिखाया है।
उस दिन से शीला ने पूर्ण श्रद्धा व नियम के साथ प्रत्येक शुक्रवार को वैभव लक्ष्मी व्रत करना आरंभ कर दिया। वह मन-वचन-कर्म से पवित्र रहकर माँ की आराधना करती, कथा का पाठ करती और संतोषपूर्वक प्रसाद ग्रहण करती। कुछ ही शुक्रवारों में उसे इसका शुभ फल दिखाई देने लगा। धीरे-धीरे उसके पति का हृदय परिवर्तित होने लगा — बुरी संगति छूट गई, व्यसन त्याग दिए और वह पुनः परिश्रम व सन्मार्ग की ओर लौट आया।
माँ लक्ष्मी की कृपा से घर में फिर से धन-धान्य आने लगा, रूठी हुई लक्ष्मी पुनः लौट आई और शीला का घर सुख, समृद्धि व प्रेम से भर गया। गृहस्थी में वही पुरानी शांति व वैभव लौट आया, बल्कि पहले से भी अधिक। शीला ने संकल्पित शुक्रवार पूर्ण होने पर विधिवत उद्यापन किया और अपने नगर की अन्य स्त्रियों को भी इस व्रत की महिमा बताई।
शीला की प्रेरणा से नगर की जिन-जिन स्त्रियों ने श्रद्धापूर्वक यह वैभव लक्ष्मी व्रत किया, उन सभी के घर भी माँ लक्ष्मी की कृपा से वैभव, सुख व शांति से भर गए। इस प्रकार वैभव लक्ष्मी व्रत की महिमा दूर-दूर तक फैल गई।
बोध: जो भक्त सच्ची श्रद्धा, संतोष व पवित्र भाव से प्रत्येक शुक्रवार माँ महालक्ष्मी की आराधना करता है, माँ लक्ष्मी उसके घर में वैभव, सद्बुद्धि व गृह-शांति की पुनर्स्थापना करती हैं। हे माँ लक्ष्मी! जैसे आपने शीला पर कृपा की, वैसे ही समस्त भक्तों पर अपनी कृपादृष्टि बनाए रखें। 🙏
संकल्प के अनुसार जब 11 या 21 शुक्रवार पूर्ण हो जाएँ, तब अंतिम शुक्रवार को व्रत का उद्यापन किया जाता है। उद्यापन के दिन व्रत की सामान्य पूजन-विधि सामान्य से अधिक श्रद्धा व उल्लास के साथ की जाती है।
माँ महालक्ष्मी की स्तुति हेतु भक्तगण श्री महालक्ष्म्यष्टकम् का पाठ भी करते हैं — इसका सम्पूर्ण शुद्ध पाठ आप हमारी वेबसाइट पर पढ़ सकते हैं।
धन-समृद्धि, गृह-शांति व दरिद्रता-निवारण हेतु विधिवत माँ लक्ष्मी पूजन व अनुष्ठान — गुरु अमिताचार्य जी के मार्गदर्शन में। पूजा-बुकिंग व परामर्श हेतु संपर्क करें 🙏
🔱 पूजा बुक करें →संकल्प के अनुसार सामान्यतः 11 या 21 शुक्रवार यह व्रत किया जाता है। जितनी संख्या का संकल्प लें, उतने शुक्रवार पूर्ण कर उद्यापन करें।
माँ लक्ष्मी को खीर अथवा कोई श्वेत मिष्ठान्न, फल व मिश्री का भोग अर्पित किया जाता है और वही प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है।
संकल्पित शुक्रवारों की संख्या पूर्ण होने पर अंतिम शुक्रवार विधिवत पूजन कर सात कुमारी/सुहागिन स्त्रियों को भोजन कराकर या भेंट देकर तथा प्रसाद वितरित कर उद्यापन किया जाता है।
स्त्री-पुरुष कोई भी श्रद्धालु यह व्रत श्रद्धा व संतोष के साथ कर सकता है। मुख्य भाव माँ लक्ष्मी के प्रति निष्ठा, संतोष व सदाचरण का है।