ज्योतिष के अनुसार मनुष्य के जीवन पर सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु व केतु — इन नौ ग्रहों का सूक्ष्म प्रभाव पड़ता है। जब जन्म-कुंडली में कोई ग्रह नीच, अस्त, शत्रु-राशि में, अशुभ भावों में या पाप-प्रभाव में हो, तो उसका फल बाधक बन सकता है। ऐसी स्थिति में नवग्रह शांति पूजन के द्वारा संबंधित ग्रहों की तुष्टि कर उनके शुभ फल की प्रार्थना की जाती है।
नवग्रह शांति कब आवश्यक मानी जाती है
ग्रह दोष: कुंडली में किसी ग्रह के नीच, अस्त या पीड़ित होने पर उस ग्रह की शांति।
शनि साढ़ेसाती व ढैया: शनि के गोचर-भ्रमण के प्रभावकाल में शनि-शांति सहित नवग्रह अनुष्ठान।
महादशा-अंतर्दशा: किसी अशुभ ग्रह की दशा-अंतर्दशा आरंभ होने पर उस काल की बाधा-शांति हेतु।
कुंडली की पीड़ाएँ: मांगलिक दोष, कालसर्प, पितृ दोष आदि के साथ ग्रहों की समग्र शांति में।
मंगल-कार्य पूर्व: गृह-प्रवेश, विवाह, व्यापार-आरंभ आदि से पूर्व मंगल-कामना हेतु।
🔱 किस ग्रह की शांति कितनी आवश्यक है, यह जन्म-कुंडली के विश्लेषण से ही तय होता है। बिना कुंडली-परीक्षण के सभी ग्रहों की समान शांति की आवश्यकता नहीं होती।
नौ ग्रह, दिशा, बीज मंत्र, समिधा व दान
नवग्रह मंडल में प्रत्येक ग्रह का एक निश्चित स्थान/दिशा होता है; केंद्र में सूर्य की स्थापना की जाती है और शेष ग्रह निर्धारित दिशाओं में स्थापित किए जाते हैं। नीचे प्रत्येक ग्रह का बीज मंत्र, हवन-समिधा (काष्ठ) तथा दान वस्तु दी गई है:
ग्रह
बीज मंत्र
समिधा (हवन काष्ठ)
दान वस्तु
सूर्य (केंद्र)
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः
आक / मदार
गेहूँ, गुड़, ताँबा
चंद्र (आग्नेय)
ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्राय नमः
पलाश (ढाक)
चावल, दूध, चाँदी
मंगल (दक्षिण)
ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः
खैर (खदिर)
मसूर, गुड़, ताँबा
बुध (ईशान)
ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः
अपामार्ग
मूँग, हरी वस्तु
गुरु (उत्तर)
ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः
पीपल
चना दाल, हल्दी, पुष्पराग
शुक्र (पूर्व)
ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः
गूलर (उदुम्बर)
चावल, घी, श्वेत वस्त्र
शनि (पश्चिम)
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
शमी
तिल, तेल, लोहा, काले वस्त्र
राहु (नैऋत्य)
ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः
दूर्वा
तिल, नीलम
केतु (वायव्य)
ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः
कुश (दर्भ)
सप्तधान्य
🕉️ जप-संख्या ग्रहानुसार भिन्न होती है (उदा. सूर्य 7000, चंद्र 11000, मंगल 10000, बुध 9000, गुरु 19000, शुक्र 16000, शनि 23000, राहु 18000, केतु 17000 — मान्यता-भेद संभव)। हवन में आहुति जप-संख्या का दशांश दी जाती है। विस्तृत मंत्रों के लिए देखें — नवग्रह शांति मंत्र।
शुभ दिन व मुहूर्त
प्रत्येक ग्रह का अपना वार होता है, अतः जिस ग्रह-प्रधान शांति करानी हो, उसके वार पर अनुष्ठान श्रेष्ठ माना जाता है — रविवार (सूर्य), सोमवार (चंद्र), मंगलवार (मंगल), बुधवार (बुध), गुरुवार (गुरु), शुक्रवार (शुक्र) व शनिवार (शनि)। राहु-केतु हेतु शनिवार/बुधवार उपयुक्त माने जाते हैं।
समग्र नवग्रह शांति के लिए शुक्ल पक्ष तथा शुभ तिथि-नक्षत्र श्रेष्ठ हैं।
अमावस्या पितृ-संबंधी व शनि-राहु शांति हेतु उपयुक्त मानी जाती है।
ग्रह के गोचर, दशा-आरंभ या साढ़ेसाती के काल में आचार्य से मुहूर्त निकलवाना उचित है।
📿 सटीक मुहूर्त यजमान की जन्म-कुंडली, चंद्र-बल व ग्रह-स्थिति देखकर आचार्य द्वारा निर्धारित किया जाना चाहिए।
पूजन सामग्री
स्थापना: नवग्रह मंडल/चौकी, नवग्रह की मूर्ति या नौ वर्ण के अक्षत/समिधा, ताम्र-कलश, नारियल, आम्र-पल्लव।
दान: ऊपर तालिका में उल्लिखित ग्रहानुसार दान-वस्तुएँ।
पूजन विधि
संकल्प व शुद्धि: यजमान स्नान कर पूर्व/उत्तराभिमुख आसन ग्रहण करते हैं; आचमन, पवित्रीकरण के पश्चात् आचार्य के निर्देशन में ग्रह-शांति व अभीष्ट-कल्याण का संकल्प लेते हैं।
गणेश-कलश पूजन: विघ्न-निवारण हेतु प्रथम श्रीगणेश, गौरी व मंगल-कलश की स्थापना व पूजन; इष्ट-देव व नवग्रह-अधिष्ठाता देवताओं का स्मरण।
नवग्रह मंडल स्थापना: चौकी/वेदी पर नवग्रह मंडल बनाकर नौ ग्रहों को उनकी दिशा में स्थापित किया जाता है — केंद्र में सूर्य, आग्नेय में चंद्र, दक्षिण में मंगल, ईशान में बुध, उत्तर में गुरु, पूर्व में शुक्र, पश्चिम में शनि, नैऋत्य में राहु व वायव्य में केतु।
आवाहन व पूजन: प्रत्येक ग्रह का उसके बीज मंत्र से आवाहन कर रोली-चंदन, अक्षत, वर्ण-पुष्प, धूप-दीप व नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं; अधिष्ठाता व प्रत्यधिष्ठाता देवताओं का भी पूजन होता है।
जप (मंत्र-अनुष्ठान): संकल्पित ग्रह/समस्त ग्रहों के बीज मंत्रों का निर्धारित संख्या में जप किया जाता है; एकल ग्रह-शांति में उसी ग्रह का जप प्रधान होता है।
नवग्रह हवन: अग्नि-स्थापना के पश्चात् प्रत्येक ग्रह के बीज मंत्र से उसकी निर्धारित समिधा (सूर्य-आक, चंद्र-पलाश, मंगल-खैर, बुध-अपामार्ग, गुरु-पीपल, शुक्र-गूलर, शनि-शमी, राहु-दूर्वा, केतु-कुश), घृत व तिल-जौ से आहुतियाँ दी जाती हैं।
पूर्णाहुति: समस्त आहुतियों के पश्चात् नारियल व सामग्री सहित पूर्णाहुति देकर शांति-पाठ किया जाता है।
दान व आशीर्वाद: तालिकानुसार ग्रह-संबंधी दान-वस्तुएँ, दक्षिणा व ब्राह्मण-भोज के साथ अनुष्ठान का समापन एवं आशीर्वचन।
नवग्रह शांति का उद्देश्य ग्रहों के प्रति श्रद्धा व कृतज्ञता व्यक्त कर उनके शुभ फल की प्रार्थना करना है। इससे ग्रह-जनित बाधाओं में शमन, मानसिक शांति, आरोग्य, कार्य-सिद्धि व सकारात्मक ऊर्जा की कामना की जाती है। यह भय या भ्रम का विषय नहीं, अपितु ग्रह-चेतना के साथ सामंजस्य स्थापित करने का एक मांगलिक कर्मकांड है, जो श्रद्धा, संयम व सत्कर्म के साथ अधिक फलदायी माना जाता है।
सावधानी
⚠️ नवग्रह शांति सदैव जन्म-कुंडली के अनुसार ही करानी चाहिए — कौन-सा ग्रह पीड़ित है, कितनी शांति व कितने जप की आवश्यकता है, यह अनुभवी आचार्य ही निर्धारित करते हैं।
बिना कुंडली-परीक्षण के मनमाने अनुष्ठान से बचें; प्रत्येक ग्रह की समिधा, वर्ण व दान का यथावत पालन आवश्यक है।
हवन में सही समिधा व शुद्ध सामग्री का प्रयोग करें; अशुद्ध या टूटी समिधा वर्जित है।
जप-हवन-दान का क्रम व संख्या आचार्य के मार्गदर्शन में ही पूर्ण करें।
यह भय का नहीं, श्रद्धा व मंगल-कामना का संस्कार है — इसे अनुशासन व सात्त्विक भाव से संपन्न कराएँ।
🕉️ कुंडली-अनुसार विधिवत नवग्रह शांति अनुष्ठान
ग्रह दोष, साढ़ेसाती व दशा-बाधा हेतु सही मुहूर्त, बीज मंत्र जप, नौ समिधाओं से हवन व ग्रहानुसार दान — गुरु अमिताचार्य जी के मार्गदर्शन में। अनुष्ठान हेतु संपर्क करें 🙏
जब कुंडली में ग्रह दोष, शनि की साढ़ेसाती/ढैया, किसी अशुभ ग्रह की महादशा-अंतर्दशा, या ग्रहों की पीड़ादायक स्थिति हो, तब आचार्य के परामर्श से शुभ मुहूर्त में नवग्रह शांति करवाई जाती है।
नवग्रह हवन में किस ग्रह की कौन-सी समिधा है?
सूर्य-आक (मदार), चंद्र-पलाश, मंगल-खैर, बुध-अपामार्ग, गुरु-पीपल, शुक्र-गूलर (उदुम्बर), शनि-शमी, राहु-दूर्वा तथा केतु-कुश (दर्भ)। प्रत्येक की आहुति उसी ग्रह के बीज मंत्र से दी जाती है।
क्या नवग्रह शांति घर पर की जा सकती है?
विधिवत मंडल स्थापना, आवाहन, जप व नौ समिधाओं से हवन हेतु अनुभवी आचार्य का मार्गदर्शन आवश्यक है; सामान्य जप-नमस्कार श्रद्धापूर्वक घर पर किया जा सकता है।
नवग्रह दान का क्या महत्व है?
ग्रह की संबंधित वस्तु का दान ग्रह-तुष्टि का सरल उपाय है — जैसे शनि हेतु तिल-तेल-लोहा-काले वस्त्र, गुरु हेतु चना दाल-हल्दी। दान संकल्प व श्रद्धा से देना चाहिए।