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🙏 🙏 माँ दक्षिणा काली — काली का सौम्य-वरद स्वरूप, तंत्र परम्परा की मूल देवी (महाकाली तंत्र पीठ की अधिष्ठात्री)। इस स्तोत्र के 26 श्लोक पहले माँ के उग्र-मुक्तिदायी रूप की वंदना करते हैं, फिर विद्या, विजय, धन, रक्षा व मोक्ष की प्रार्थना। शास्त्र (श्लोक 26): जो श्रद्धा से दिन या संध्या में पाठ करे, उसे धन-धान्य व संतान अवश्य मिलती है।
🔱 काली जैसी उग्र साधना पारम्परिक रूप से केवल गुरु-दीक्षा द्वारा ग्रहण की जाती है।
ॐ कृशोदरि महाचण्डि मुक्तकेशि बलिप्रिये । कुलाचारप्रसन्नास्ये नमस्ते शङ्करप्रिये ॥ १ ॥घोरदंष्ट्रे कोटराक्षि गीतिशब्द-प्रसाधिनि । घुरघोरारवास्फारे नमस्ते चित्तवासिनि ॥ २ ॥बन्धूकपुष्प-सङ्काशे त्रिपुरे भयनाशिनि । भाग्योदय-समुत्पन्ने नमस्ते वरवर्णिनि ॥ ३ ॥जय देवि जगद्धात्रि त्रिपुराद्ये त्रिदेवते । भक्तेभ्यो वरदे देवि महिषघ्नि नमोऽस्तुते ॥ ४ ॥घोरविघ्न-विनाशाय कुलाचार-समृद्धये । नमामि वरदे देवि मुण्डमाला-विभूषणे ॥ ५ ॥रक्तधारा-समाकीर्णे कलकाञ्ची-विभूषिते । सर्वविघ्नहरे कालि नमस्ते भैरवप्रिये ॥ ६ ॥नमस्ते दक्षिणामूर्त्ते कालि त्रिपुरभैरवि । भिन्नाञ्जन-चयप्रख्ये प्रवीण-शवसंस्थिते ॥ ७ ॥गलच्छोणित-धाराभिः स्मेरानन-सरोरुहे । पीनोन्नत-कुचद्वन्द्वे नमस्ते घोरदक्षिणे ॥ ८ ॥आरक्तमुखशान्ताभिर्नेत्रालिभिर्विराजिते । शवद्वय-कृतोत्तंसे नमस्ते मदविह्वले ॥ ९ ॥पञ्चाशन्मुण्ड-घटितमाला-लोहितलोहिते । नानामणि-विशोभाढ्ये नमस्ते ब्रह्मसेविते ॥ १० ॥शवास्थि-कृतकेयूरे शङ्ख-कङ्कण-मण्डिते । शववक्षःसमारूढे नमस्ते विष्णुपूजिते ॥ ११ ॥शवमांसकृतग्रासे साट्टहासे मुहुर्मुहुः । मुखशीघ्र-स्मितामोदे नमस्ते शिववन्दिते ॥ १२ ॥खड्गमुण्डधरे वामे सव्येऽभयवरप्रदे । दन्तुरे च महारौद्रे नमस्ते चण्डनायिके ॥ १३ ॥त्वं गतिः परमा देवि त्वं माता परमेश्वरि । त्राहि मां करुणासार्द्रे नमस्ते चण्डनायिके ॥ १४ ॥नमस्ते कालिके देवि नमस्ते भक्तवत्सले । मूर्खतां हर मे देवि प्रतिभा-जयदायिनि ॥ १५ ॥गद्यपद्यमयीं वाणीं तर्क-व्याकरणादिकम् । अनधीतागतां विद्यां देहि दक्षिणकालिके ॥ १६ ॥जयं देहि सभामध्ये धनं देहि धनागमे । देहि मे चिरजीवित्वं कालिके रक्ष दक्षिणे ॥ १७ ॥राज्यं देहि यशो देहि पुत्रान् दारान् धनं तथा । देहान्ते देहि मे मुक्तिं जगन्मातः प्रसीद मे ॥ १८ ॥ॐ मङ्गला भैरवी दुर्गा कालिका त्रिदशेश्वरी । उमा हैमवती कन्या कल्याणी भैरवेश्वरी ॥ १९ ॥काली ब्राह्मी च माहेशी कौमारी वैष्णवी तथा । वाराही वासवी चण्डी त्वां जगुर्मुनयः सदा ॥ २० ॥उग्रतारेति तारेति शिवेत्येकजटेति च । लोकोत्तरेति कालीति गीयसे कृतिभिः सदा ॥ २१ ॥यथा काली तथा तारा तथा छिन्ना च कुल्लुका । एकमूर्त्तिश्चतुर्भेदा देवि त्वं कालिका पुरा ॥ २२ ॥एकद्वि-त्रिविधा देवी कोटिधानन्तरूपिणी । अङ्गाङ्गिकैर्नामभेदैः कालिकेति प्रगीयते ॥ २३ ॥शम्भुः पञ्चमुखेनैव गुणान् वक्तुं न ते क्षमः । चापल्यैर्यत्कृतं स्तोत्रं क्षमस्व वरदा भव ॥ २४ ॥प्राणान् रक्ष यशो रक्ष पुत्रान् दारान् धनं तथा । सर्वकाले सर्वदेशे पाहि दक्षिणकालिके ॥ २५ ॥यः सम्पूज्य पठेत् स्तोत्रं दिवा वा रात्रिसन्ध्ययोः । धनं धान्यं तथा पुत्रं लभते नात्र संशयः ॥ २६ ॥॥ इति दक्षिणकालिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
About: The Dakshina Kalika Stotram is a hymn to Maa Dakshina Kali — the supreme, benevolent form of Goddess Kali worshipped in the Tantra tradition (and the presiding deity of Mahakali Tantra Pith). Its 26 verses first adore Her fierce, liberating form, then pray for wisdom, victory, wealth, protection and final liberation. Verse 26 promises that one who recites it with devotion, by day or at the sandhya hours, gains wealth, grain and progeny without doubt.Adoration (v.1–6): Salutations to the slender-waisted great Chandi, loose-haired, fond of offerings, gracious to the devotee; the fierce-fanged, deep-eyed one delighting in sacred song; radiant as the bandhuka flower, dweller in the three worlds, remover of fear; victory to the World-Mother, slayer of Mahisha; adorned with a garland of skulls, destroyer of every obstacle, beloved of Bhairava.Her form (v.7–13): Salutations to Her as Dakshinamurti-Kali, dark as collyrium, seated upon a corpse; smiling-faced amid streams of blood; wearing two corpses as earrings, intoxicated with bliss; garlanded with fifty freshly-severed heads, adorned with gems, worshipped by Brahma, Vishnu and Shiva; armed with sword and severed head in Her left hands and granting boon and fearlessness with Her right — the terrible yet gracious Chanda-Nayika.Surrender & prayer (v.14–18): You are the highest refuge, O Mother, Supreme Goddess — save me, O compassion-drenched one. Remove my ignorance, grant eloquence in prose and verse, logic and grammar, and knowledge unstudied. Grant victory in assembly, wealth in trade, long life, kingdom, fame, children and, at life's end, liberation — be gracious to me, Mother of the worlds.Her many names & unity (v.19–23): You are Mangala, Bhairavi, Durga, Kalika, Uma, Kalyani; Brahmi, Maheshi, Kaumari, Vaishnavi, Varahi, Chandi — so the sages ever sing. As Ugra-Tara, Shiva, Ekajata and Kali You are hymned; as Kali, Tara, Chhinnamasta and Kullaka — one form in fourfold shape, of infinite forms, sung by countless names, yet ever the one Kalika.Closing (v.24–26): Even five-faced Shambhu cannot fully tell Your glories — forgive, O boon-giver, this hymn made in my simple devotion. Guard my life, honour, children, family and wealth in every time and place, O Dakshina Kali. Whoever worships and recites this hymn, by day or at twilight, surely gains wealth, grain and progeny.
॥ भावार्थ (हिन्दी अर्थ) ॥श्लोक 1–6 — वंदना: कृशोदरी महाचण्डी, मुक्तकेशी, बलि-प्रिया, शंकर-प्रिया को नमन; घोर दाढ़ों व गहरी आँखों वाली, बंधूक-पुष्प सी आभा वाली, त्रिपुरा, भय-नाशिनी; जगद्धात्री, महिषासुर-मर्दिनी, मुण्डमाला-विभूषिता, सर्व-विघ्न-हारिणी, भैरव-प्रिया को प्रणाम।श्लोक 7–13 — दिव्य स्वरूप: दक्षिणामूर्ति काली, अंजन-सी श्याम, शव पर विराजित; रक्त-धाराओं के बीच मुस्कान भरे मुख वाली; दो शवों के कुण्डल, पचास मुण्डों की माला, रत्न-आभूषणों से सज्जित — ब्रह्मा-विष्णु-शिव द्वारा पूजित; बाएँ हाथों में खड्ग व मुण्ड, दाहिने में वर व अभय — उग्र पर वरदायिनी चण्डनायिका।श्लोक 14–18 — शरणागति व प्रार्थना: 'हे माँ, तुम्हीं परम गति व परमेश्वरी हो — करुणा कर मेरी रक्षा करो। मेरी मूर्खता हरो, वाणी-तर्क-व्याकरण व अनपढ़ी विद्या दो; सभा में विजय, व्यापार में धन, दीर्घायु, राज्य, यश, संतान और अंत में मुक्ति दो।'श्लोक 19–23 — अनेक नाम व एकता: तुम्हीं मंगला, भैरवी, दुर्गा, कालिका, उमा; ब्राह्मी-वैष्णवी-वाराही-चण्डी; उग्रतारा-एकजटा-काली रूप में गाई जाती हो — काली, तारा, छिन्ना, कुल्लुका — एक ही मूर्ति के चार भेद, अनंत रूप, पर मूलतः एक कालिका।श्लोक 24–26 — क्षमा व फलश्रुति: 'पंचमुख शिव भी तुम्हारे गुण पूरे नहीं कह सकते — मेरी सरल भक्ति से बना यह स्तोत्र क्षमा करना। हर समय-स्थान में मेरे प्राण, यश, परिवार व धन की रक्षा करो।' जो श्रद्धा से दिन या संध्या में इसका पाठ करता है, उसे धन-धान्य व संतान अवश्य मिलती है।
📿 दक्षिणा काली साधना हेतु मार्गदर्शन
दक्षिणा काली की पूर्ण साधना विधि, कवच, अभिमंत्रित यंत्र व माला तथा गुरु मार्गदर्शन हेतु महाकाली तंत्र पीठ से जुड़ें। किसी भी उग्र साधना/अनुष्ठान से पहले गुरु से परामर्श अवश्य लें।